भ्रम में ही रहने दो, कुछ तो अच्छा लगता है।
हक़ीक़त में कौन यहॉं किस को अच्छा लगता हैं,
जो कभी मुझसे बात करने के लिए मेरा इंतजार किया करते थे,
अब उन्हें ही मेरी बातों में कहा अच्छा लगता हैं।
ना हॅू रोशनी, किसी की ऑखों की, ना हूॅं चौन, किसी के दिल का मैं,
जो काम किसी के, आ ना सके, मुट्ठी भर बस, वही धूल हॅू मैं।।
ना दवा किसी के दर्द की मैं, ना सुकून किसी की आखों का,
ना हवा सा तेरे पास कहीं मैं, ना ही तेरी, मीठी नींद हूॅ मैं।।
क्यो दुआ करे, मेरे लिए कोई, क्यो आए, चढ़ाने फूल कोई,
क्यो दीप जलाए, मेरे लिए कोई, जब मान चुके सब, बेकार हूॅ मैं।।
ना रागए, ना अनुराग हॅू मैं,ना भाग्य, ना चरित्र हूॅ मैं,
जो टूट चुका, आकार वही मैं, जो उतर चुका, श्रृंगार वही मैं।।
मैं राग ना कोई जीवन का, क्यो सुनने, कोई बैठेगा,
मै आवाज़ हूॅ, एक दर्द भरी, कोई कैसे सुन कर हॅंस देगा।।
बस एक जगह ही ठहरा हॅू मैं, ना पास किसी सेे, ना ही दूर हॅू मैं,
जो बदल गया, वही भाग्य हॅू मैं, जहॉ पहुॅच ना सके, वही मंजिल हॅू मैं।।
मुझे
जलाने आओ तो फिर, बस इतना तुम याद रखना,
बैठो मेरे पास अगर तो, मुझको ही तुम याद करना।
भीड़
तो होगी—खूब मगर, चर्चाओं में न खोना तुम,
पीठ
न दिखाना मुझको तुम, बस मुझे ही देखा करना तुम।
आँखें
मेरी बंद होंगी, फिर भी नज़रें मिलाऊँगा,
महसूस
करोगे मुझको तो, बहुत कुछ कह जाऊँगा।
कुछ
नाम मेरा पुकारेंगे, पर आवाज़ वहीं की वहीं
गूँजेगी,
मेरे
न होने की सच्चाई अब सबके भीतर बैठेगी।
जैसा
भी था—अच्छा, बुरा, अब कोई हिसाब न लगाएगा,
मेरे
जाते ही हर ज़ुबान पर “अच्छा इंसान था” रह जाएगा।
जो
बातों में काँटा था कभी, अब यादों में फूल बन जाऊँगा,
मेरे
रहते जो समझ न पाए, अब सबको समझ आ जाऊँगा।
आग
की लपटों में घिरा हुआ, अब कोई शोर न मचाऊँगा,
है से था के इस सफ़र में पता
नहीं कहाँ रह जाऊँगा।
अब
न कोई सवाल बचेगा, न ही शब्दों से कोई बवाल उठेगा।
जो मुझे समझ सके न कभी, उनको अब बस मेरी
कमी का एहसास रहेगा।
भ्रम में ही रहने दो, कुछ तो अच्छा लगता है। हक़ीक़त में कौन यहॉं किस को अच्छा लगता हैं, जो कभी मुझसे बात करने के लिए मेरा इंतजार किया करते थे...